नागपुर न्यूज डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय का दौरा राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा था। पिछले साल भाजपा और संघ के बीच कुछ मतभेद की खबरें सामने आई थीं, जिससे इस यात्रा पर सभी की नजरें टिकी थीं। हालांकि, हाल के दिनों में मोदी ने संघ की खुलकर सराहना की है, जिससे यह स्पष्ट हो गया था कि दोनों संगठनों के बीच कोई कटुता नहीं बची है। प्रधानमंत्री का हेडगेवार स्मृति मंदिर जाना, जो आरएसएस के पहले दो सरसंघचालकों की याद में बना है, संघ के भीतर भी अप्रत्याशित माना गया। इसे भाजपा और संघ के बीच संबंधों को और मजबूत करने और एकता दर्शाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। इसी कड़ी में मोदी ने नागपुर में डॉ. आंबेडकर की दीक्षाभूमि जाकर भी अपनी राजनीतिक रणनीति को स्पष्ट किया। यह वही स्थान है, जहां आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था, और मोदी की यह यात्रा एक व्यापक सामाजिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में हिंदुत्व की विचारधारा को लेकर जनता में एक बड़ा उभार देखा गया, जिसका उदाहरण हालिया प्रयागराज कुंभ में देखने को मिला। 65 करोड़ से अधिक लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया और इसे एक हिंदू पुनर्जागरण के रूप में देखा गया। आरएसएस का इस आयोजन में गहरा योगदान रहा, और इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी ने संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका की खुलकर तारीफ की। यह दर्शाता है कि भाजपा और संघ अब न केवल सहयोगी हैं, बल्कि भाजपा के मूल एजेंडे में संघ की भूमिका और अधिक मजबूत हो गई है। संघ भी यह समझ चुका है कि हिंदुत्व की मौजूदा लहर में वह भाजपा से अलग नहीं रह सकता। पिछले कुछ चुनावों में आरएसएस की सक्रिय भागीदारी भी यही संकेत देती है कि भाजपा के राजनीतिक समीकरणों में संघ की उपस्थिति अब केवल वैचारिक नहीं, बल्कि निर्णायक होती जा रही है।
एक समय ऐसा था जब भाजपा और संघ के बीच सीमाएं स्पष्ट थीं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने खुद एक पूर्व प्रचारक होने के नाते हमेशा संघ की प्रशंसा करने में संकोच नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी जहां संघ की खुली सराहना से बचते थे, वहीं मोदी ने संघ को राष्ट्रनिर्माण और विकास में एक अहम सहयोगी बताया। हाल ही में अपने एक पॉडकास्ट में भी उन्होंने संघ को अपने जीवन का मार्गदर्शक बताया था। नागपुर दौरे के दौरान भी मोदी ने 2047 तक विकसित भारत के सपने में संघ की भूमिका को रेखांकित किया। यह भी साफ हो गया कि भाजपा के भीतर नए अध्यक्ष और मोदी के उत्तराधिकारी को तैयार करने में संघ की भूमिका निर्णायक होगी। मोदी का दीक्षाभूमि जाना भी दलित समाज को साधने की एक रणनीति थी, क्योंकि भाजपा और संघ दोनों अब दलितों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। मोदी ने वहां आंबेडकर को श्रद्धांजलि देकर यह संदेश दिया कि उनकी सरकार संविधान और दलित समाज के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।