अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 2 अप्रैल से पारस्परिक टैरिफ लगाने जा रहे हैं। इस फैसले ने वैश्विक बाजारों में चिंता की लहर दौड़ा दी है। दुनिया भर के देश इस बात को लेकर सतर्क हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का उनके प्रति क्या रवैया रहेगा। इन टैरिफ से प्रभावित देशों की सूची में भारत भी शामिल है। भारत ने ट्रंप के टैरिफ से बचने के लिए अतीत में कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इससे ट्रंप संतुष्ट हैं। ऐसे में कल का दिन भारत के लिए भी निर्णायक साबित हो सकता है।
भारत का नाम फिर लिया गया
डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि पारस्परिक टैरिफ सभी देशों पर लागू होंगे, न कि केवल उन 10-15 देशों पर जिनका व्यापार असंतुलन सबसे अधिक है। इस घोषणा का अर्थ यह है कि 2 अप्रैल के बाद से वैश्विक व्यापार में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। ट्रंप का तर्क है कि असमान टैरिफ के कारण अमेरिका को भारी व्यापार घाटे का सामना करना पड़ता है। उनका मानना है कि नए टैरिफ से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अनुचित वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सकेगा और इसे और मजबूत किया जा सकेगा। इस बीच, व्हाइट हाउस ने मंगलवार को भारत का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका भारत के टैरिफ ढांचे से नाखुश है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों पर 100% शुल्क लगाता है। यह बयान भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों को और जटिल बना सकता है।
किन देशों पर अमेरिका की नजर?
सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैसेट ने एक साक्षात्कार में कहा कि अमेरिकी सरकार मुख्य रूप से उन 10 से 15 देशों पर नजर रख रही है जो अमेरिका के व्यापार घाटे में सबसे अधिक योगदान दे रहे हैं। हालांकि हैसेट ने उन देशों के नाम नहीं बताए, लेकिन वाणिज्य विभाग के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि 2024 में चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा सबसे अधिक था।
इसके अलावा, जिन देशों पर अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है, उनमें शामिल हैं:
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यूरोपीय संघ
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मैक्सिको
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वियतनाम
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आयरलैंड
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जर्मनी
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ताइवान
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जापान
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दक्षिण कोरिया
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कनाडा
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भारत
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थाईलैंड
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इटली
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स्विट्जरलैंड
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मलेशिया
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इंडोनेशिया
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फ्रांस
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ऑस्ट्रिया
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स्वीडन
अगर इन देशों को देखा जाए, तो भारत भी अमेरिका की निगरानी सूची में एक प्रमुख स्थान पर है।
भारत बड़ी कटौती के लिए तैयार?
भारत लगातार इस मुद्दे पर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। इस संदर्भ में, भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री अमेरिका का दौरा भी कर चुके हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, भारत 23 अरब डॉलर के अमेरिकी आयात पर शुल्क में कटौती करने के लिए भी तैयार हो सकता है। ट्रंप भी ऐसी रिपोर्टों से अवगत हैं और उन्होंने हाल ही में कहा कि उन्होंने सुना है कि भारत अब अमेरिकी वस्तुओं पर कर कम करने जा रहा है। उनका मानना है कि टैरिफ बढ़ाने के इस फैसले से कई देशों की व्यापारिक नीतियों में सुधार होगा और अमेरिका के व्यापार घाटे को कम किया जा सकेगा।
क्या भारतीय कंपनियों को होगा नुकसान?
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति से भारत के निम्नलिखित उद्योगों को भारी नुकसान हो सकता है:
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फार्मास्युटिकल्स: भारत विश्व में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है। वर्तमान में, अमेरिका भारतीय दवा उत्पादों के आयात पर शून्य शुल्क लगाता है, जबकि भारत अमेरिकी दवा आयात पर लगभग 10% शुल्क लगाता है। पारस्परिक टैरिफ के तहत, अमेरिका भी 10% टैरिफ लगा सकता है।
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केमिकल इंडस्ट्री: भारत अमेरिका को कई रसायन और औद्योगिक उत्पाद निर्यात करता है। नए टैरिफ से इस क्षेत्र को झटका लग सकता है।
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टेक्सटाइल और गारमेंट: भारतीय कपड़ा उद्योग अमेरिका के प्रमुख बाजारों में से एक है। अगर अमेरिका आयात शुल्क बढ़ाता है, तो यह क्षेत्र आर्थिक दबाव में आ सकता है।
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ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग सेक्टर: भारत के ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग सेक्टर के लिए अमेरिका एक बड़ा बाजार है। नए टैरिफ इन क्षेत्रों के निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं।
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सोलर एनर्जी सेक्टर: भारत अमेरिका को सौर पैनल और उपकरण निर्यात करता है। अगर अमेरिका टैरिफ बढ़ाता है, तो भारतीय सौर उद्योग को भी नुकसान हो सकता है।
वैश्विक व्यापार पर प्रभाव
ट्रंप के इस फैसले का प्रभाव केवल भारत पर ही नहीं बल्कि पूरे वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है। चीन और यूरोपीय संघ जैसे देशों ने पहले ही इस नीति की आलोचना की है और वे अमेरिका के इस कदम के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने की योजना बना रहे हैं।अगर अमेरिका अपने नए टैरिफ को सख्ती से लागू करता है, तो यह एक नया वैश्विक व्यापार युद्ध छेड़ सकता है, जिसका प्रभाव भारत सहित सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ नीति वैश्विक व्यापार में एक नया अध्याय जोड़ने जा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत और अन्य प्रभावित देश इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं। भारत सरकार ने इस मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन से बातचीत करने के संकेत दिए हैं, लेकिन क्या यह बातचीत भारत के हित में रहेगी, यह समय ही बताएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस फैसले से वैश्विक व्यापार प्रणाली में एक बड़ा बदलाव आ सकता है। अगर भारत को अमेरिकी बाजार में अपनी उपस्थिति बनाए रखनी है, तो उसे नई रणनीतियां अपनानी होंगी। 2 अप्रैल का दिन भारत के व्यापारिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।