नागपुर न्यूज डेस्क: महाराष्ट्र में नाबालिगों से जुड़े अपराधों की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। राज्य अपराध जांच विभाग (सीआईडी) की रिपोर्ट ‘क्राइम इन महाराष्ट्र-2023’ के मुताबिक, साल 2023 में नाबालिगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत 3,548 मामले दर्ज हुए, जबकि विशेष और स्थानीय कानूनों के तहत 422 मामले सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, बाल अपराधों में शामिल कुल बच्चों में से 79.83 प्रतिशत की उम्र 16 से 18 साल के बीच थी। हिंसक अपराधों के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कानून के तहत दर्ज मामलों में भी तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सीआईडी ने पिछले 10 साल के आंकड़ों की तुलना के बाद यह रिपोर्ट जारी की है। साल 2022 में नाबालिगों से जुड़े कुल 4,009 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2023 में यह संख्या 461 यानी करीब 11.5 प्रतिशत कम रही। हालांकि, विशेष और स्थानीय कानूनों के तहत दर्ज मामलों में 6.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुआ कानून के तहत अपराधों में 166.67 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। उम्र के हिसाब से 12 से 16 साल के बच्चों की हिस्सेदारी 19.58 प्रतिशत रही, जबकि 7 से 12 साल और 12 साल से कम उम्र के बच्चों की हिस्सेदारी 0.59-0.59 प्रतिशत दर्ज की गई।
पुणे में गंभीर अपराधों के सबसे ज्यादा मामले
महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले पुणे में नाबालिगों से जुड़े गंभीर अपराधों के आंकड़े सबसे ज्यादा सामने आए हैं। राज्य में नाबालिगों से जुड़े हथियारों के कुल 29 मामलों में से 11 अकेले पुणे शहर में दर्ज हुए। हत्या के मामलों में भी पुणे से सबसे ज्यादा 23 नाबालिगों को हिरासत में लिया गया। गंभीर अपराधों के तहत पुणे में 257 बच्चों के खिलाफ मामले दर्ज हुए। इसके बाद नागपुर में 251, मुंबई में 224, पिंपरी-चिंचवड़ में 214 और जालना में 197 मामले दर्ज किए गए। ये आंकड़े शहरों में नाबालिगों से जुड़े गंभीर अपराधों की स्थिति को सामने रखते हैं।
ऑनलाइन जुए और इंटरनेट से जुड़े अपराधों पर चिंता
सीआईडी के आंकड़ों के अनुसार, नाबालिगों से जुड़े हत्या के मामलों में 5.84 प्रतिशत, हत्या की कोशिश में 6.07 प्रतिशत, चोट पहुंचाने के मामलों में 20.88 प्रतिशत, दंगों में 12.37 प्रतिशत और महिलाओं से छेड़छाड़ के मामलों में 10.86 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इसके बावजूद विशेष और स्थानीय कानूनों के तहत अपराध बढ़े। आईटी कानून के तहत दर्ज मामलों में 775 प्रतिशत की बढ़ोतरी, जबकि जुआ कानून के तहत अपराधों में 166.67 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। रिटायर्ड पुलिस आयुक्त बाबासाहेब कंगाले के मुताबिक, बाल अपराधों के पीछे सिर्फ सामाजिक कारण नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति, शिक्षा, तकनीक और परिवार से जुड़ी परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। उनका कहना है कि काम के लिए माता-पिता के घर से बाहर रहने के कारण बच्चों के साथ बातचीत और उन्हें समझाने का समय कम हो रहा है। इंटरनेट पर हिंसक सामग्री तक आसानी से पहुंच होने से बच्चे सही-गलत और कानूनी-गैरकानूनी के बीच का फर्क नहीं समझ पाते और अपराध के जाल में फंस सकते हैं।