नागपुर न्यूज डेस्क: बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि 2011 में नागपुर सेंट्रल जेल के बाहर उनकी गिरफ्तारी के दौरान उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ था। ये अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले हैं। नागपुर पीठ ने 2012 में दायर उनकी याचिका पर आंशिक रूप से सुनवाई करते हुए सरकार को आठ सप्ताह के भीतर कोर्ट में मुआवजे की रकम जमा कराने का निर्देश दिया।
गिरफ्तारी का रिकॉर्ड नहीं मिलने पर कोर्ट ने उठाए सवाल
अरुण फरेरा को 8 मई 2007 को नागपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें गोंदिया और चंद्रपुर में दर्ज कई अन्य मामलों में भी आरोपी बनाया गया। हालांकि, वह आठ मामलों में बरी हो गए और एक मामले में आरोपों से मुक्त कर दिए गए। चंद्रपुर की सेशन कोर्ट से 23 सितंबर 2011 को आखिरी मामले में बरी होने के बाद उन्होंने जमानत की औपचारिकताएं पूरी कीं और 27 सितंबर को जेल से बाहर आए।
फरेरा के वकील ने कोर्ट को बताया कि 27 सितंबर को दोपहर करीब 2:30 बजे नागपुर जेल से बाहर निकलते ही सादे कपड़ों में आए गढ़चिरौली पुलिस के कुछ लोगों ने उन्हें जबरन एक ऐसी गाड़ी में बैठा लिया, जिस पर नंबर प्लेट नहीं थी। पुलिसकर्मियों ने न तो अपनी पहचान बताई और न ही उन्हें हिरासत में लेने की वजह बताई। उस समय उनकी मां, भाई और वकील जेल के बाहर मौजूद थे। उनके वकील सुरेंद्र गडलिंग ने पुलिस से शिकायत करते हुए इस घटना को अपहरण बताया था।
पुलिस की दलील को कोर्ट ने नहीं माना
महाराष्ट्र सरकार ने किसी भी तरह की गैरकानूनी कार्रवाई से इनकार किया। सरकार की ओर से कहा गया कि फरेरा को गढ़चिरौली में माओवादी गतिविधियों से जुड़े दो मामलों में गिरफ्तार करना जरूरी था। पुलिस ने यह भी दलील दी कि फरेरा को नक्सली संगठन का वरिष्ठ सदस्य माना जाता था, इसलिए सुरक्षा कारणों से गाड़ी की नंबर प्लेट हटाई गई थी और पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई डायरी रिकॉर्ड या लिखित सूचना नहीं थी, जिससे साबित हो कि गढ़चिरौली के पुलिस अधीक्षक ने फरेरा को हिरासत में लेने का निर्देश दिया था। गिरफ्तारी मेमो में भी यह दर्ज नहीं था कि गिरफ्तारी की वजह फरेरा या उनके परिवार को बताई गई थी। जजों ने कहा कि रिकॉर्ड में सिर्फ उनके वकील को गिरफ्तारी की जानकारी देने की एंट्री मिली। कोर्ट ने यह भी बताया कि 28 सितंबर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने पर फरेरा ने हिरासत में लेने के तरीके पर शिकायत की थी, लेकिन उन्हें पुलिस हिरासत में भेजने से पहले इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। पीठ ने कहा कि संविधान के तहत राज्य की जिम्मेदारी है कि गिरफ्तार व्यक्ति को हिरासत में लेने की वजह बताई जाए, ताकि वह कानूनी सलाह ले सके और अपना बचाव कर सके। कोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने अपनी कानूनी सीमाओं का उल्लंघन किया था।