नागपुर न्यूज डेस्क: मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी कर्मचारी की विवाहित बेटी भी अनुकंपा नियुक्ति पाने की हकदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर बेटी को अनुकंपा नौकरी से वंचित करना लैंगिक भेदभाव है और यह संविधान में समानता के अधिकार के खिलाफ है। यह फैसला न्यायमूर्ति वाई. जी. खोबरागड़े और न्यायमूर्ति सुशील घोड़ेसवार की खंडपीठ ने सुनाया।
मामला चंद्रपुर जिले के ताडाली निवासी कर्मचारी कवडू वानशिंगे की मृत्यु के बाद उनकी विवाहित बेटी तनुजा झाड़े की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। तनुजा ने वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन कंपनी ने राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौते (NCWA) के नियमों का हवाला देते हुए 10 अप्रैल 2025 को उनका आवेदन खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि विवाहित बेटी को अनुकंपा नौकरी नहीं दी जा सकती।
हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि शादी के बाद भी बेटी अपने माता-पिता के परिवार का अभिन्न हिस्सा रहती है। वह भावनात्मक और कई बार आर्थिक रूप से भी परिवार से जुड़ी होती है। ऐसे में सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर उसे नौकरी से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि जब विवाहित बेटे को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जाता है, तो केवल विवाहित होने के कारण बेटी को इससे वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने WCL के आदेश को रद्द करते हुए कंपनी को निर्देश दिया कि तनुजा झाड़े के आवेदन पर योग्यता और नियमों के आधार पर दो महीने के भीतर नया फैसला लिया जाए। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल शादी को आधार बनाकर बेटियों के साथ किया गया यह भेदभाव संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।