नागपुर न्यूज डेस्क: विकास के लिए जमीन जरूरी है और अन्न के लिए खेती। दोनों जरूरतें एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन अगर विकास की रफ्तार बढ़ने के साथ खेती की जमीन लगातार कम होती गई तो आने वाले समय में इसका असर गंभीर हो सकता है। नागपुर जिले में सड़क, औद्योगिक परियोजनाओं, सिंचाई योजनाओं और नई बस्तियों के लिए 6 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन अधिग्रहित होने जा रही है। इसमें बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन भी शामिल है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विकास के साथ खेती को कैसे बचाया जाए।
नागपुर शहर और आसपास के इलाकों में तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण खेती की जमीन पर दबाव बढ़ रहा है। काटोल, हिंगणा, कामठी, उमरेड, कुही और भिवापूर जैसे क्षेत्रों में भी इसका असर दिख रहा है। जमीन एक बार आवासीय या व्यावसायिक इस्तेमाल में चली जाए तो उसे दोबारा खेती के लिए इस्तेमाल करना आसान नहीं होता। इसलिए जमीन अधिग्रहण के दौरान यह तय करना जरूरी है कि सबसे उपजाऊ जमीन की जगह कम उत्पादक या पहले से गैर-कृषि इस्तेमाल वाली जमीन का विकल्प अपनाया जा सकता है या नहीं।
वहीं, पड़ी हुई जमीन का बेहतर इस्तेमाल भी इस समस्या का एक रास्ता हो सकता है। जिन बंजर या पड़ी जमीनों पर दोबारा खेती संभव है, वहां उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दिया जा सकता है। इसके साथ ही कम जमीन में ज्यादा फसल लेने के लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज, सिंचाई, मिट्टी संरक्षण और फसल चक्र में बदलाव जरूरी होगा। सिर्फ खेती की जमीन बचाना ही नहीं, बल्कि उपलब्ध जमीन की उत्पादकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।
विकास परियोजनाओं का विरोध समाधान नहीं है, क्योंकि सड़क, उद्योग, सिंचाई और शहरों के विस्तार के लिए जमीन की जरूरत होगी। लेकिन हर परियोजना से पहले जमीन की उत्पादकता, सिंचाई सुविधा और स्थानीय अन्न उत्पादन में उसकी भूमिका का आकलन होना चाहिए। नागपुर में विकास की रफ्तार बढ़ रही है, ऐसे में जरूरी है कि विकास का नक्शा बनाते समय खेती की जमीन को सिर्फ ‘खाली जमीन’ न माना जाए। आज लिया गया जमीन का फैसला आने वाले वर्षों की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकता है।