नागपुर न्यूज डेस्क: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि पत्नी को ससुराल के किचन में प्रवेश करने से रोकना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के की पीठ ने पति के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया, हालांकि महिला की सास को इस मामले में राहत प्रदान की गई है।
अकोला की रहने वाली एक महिला ने अपने पति और सास के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि 2022 में हुई शादी के बाद से ही उसे प्रताड़ित किया जा रहा था। उसे घर के किचन में जाने और खाना बनाने की इजाजत नहीं थी, बल्कि उसे बाहर से खाना लाने के लिए मजबूर किया जाता था। इसके अलावा, उस पर मायके जाने पर पाबंदी, सामान बाहर फेंकने और तलाक के लिए दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पति का ऐसा व्यवहार जानबूझकर किया गया प्रतीत होता है, जो महिला को मानसिक रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए काफी है। अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत इसे 'क्रूरता' की श्रेणी में माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि ऐसा कोई भी व्यवहार है जो महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पहुँचाए।
वहीं, सास के मामले में कोर्ट ने पाया कि उन पर लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं। अदालत ने कहा कि सिर्फ सास होने के नाते किसी को बिना ठोस आधार के कानूनी कार्रवाई में नहीं घसीटा जा सकता। इसी आधार पर सास के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया गया, जबकि पति को अब मुकदमे का सामना करना होगा।