नागपुर न्यूज डेस्क: महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने नागपुर के मशहूर सावजी खाने को लेकर दिए गए अपने विवादित बयान पर माफी मांगने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि यह उनकी निजी राय थी और इसका उद्देश्य केवल ज्यादा तेल और मसाले वाले भोजन से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति लोगों को जागरूक करना था।
विवाद उस समय शुरू हुआ जब एक सार्वजनिक कार्यक्रम में तुकाराम मुंढे ने कहा था कि अगर वह सावजी खाना खा लें तो उन्हें एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि इस तरह का ज्यादा तेल और मसाले वाला खाना नियमित रूप से खाने से हृदय रोग समेत कई लाइफस्टाइल बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
उनके इस बयान के बाद नागपुर के सावजी रेस्टोरेंट संचालकों और सावजी समाज के लोगों ने कड़ी नाराजगी जताई। उनका आरोप है कि इस बयान से नागपुर की पारंपरिक और प्रसिद्ध सावजी संस्कृति की छवि खराब हुई है। कई रेस्टोरेंट मालिकों ने उनसे बयान वापस लेने और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की।
हालांकि बुधवार को मीडिया से बातचीत में मुंढे अपने बयान पर कायम रहे। उन्होंने कहा, "वह मेरी निजी टिप्पणी थी। माफी मांगने का कोई सवाल ही नहीं उठता।"
इस बीच प्रसिद्ध शेफ विष्णु मनोहर ने सावजी खाने का समर्थन करते हुए कहा कि यह सिर्फ तीखा मांसाहारी भोजन नहीं, बल्कि नागपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है। उनके मुताबिक, सावजी व्यंजनों की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब मध्य प्रदेश के मुलताई, बैतूल और छिंदवाड़ा से बड़ी संख्या में कोष्टी समुदाय के लोग नागपुर की कपड़ा मिलों में काम करने आए थे। लंबे समय तक काम करने के बाद मजदूर शाम को एक साथ खाना बनाते थे और वहीं से अलग-अलग मसालों के प्रयोग के साथ सावजी शैली विकसित हुई।
उन्होंने बताया कि असली सावजी मसाले में करीब 32 तरह के मसालों का इस्तेमाल होता है। तेल में मिर्च को धीमी आंच पर भूनने से इसकी खास खुशबू, गहरा रंग और तीखा स्वाद तैयार होता है। समय के साथ इसमें शाकाहारी व्यंजन भी शामिल किए गए और आज यह नागपुर के अलावा भंडारा, गढ़चिरौली, वर्धा, चंद्रपुर, अमरावती और बुलढाणा समेत कई जिलों में बेहद लोकप्रिय है।
मुंढे के बयान के बाद अब यह बहस भी तेज हो गई है कि पारंपरिक खानपान की सांस्कृतिक पहचान और स्वस्थ जीवनशैली के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।